-दद्दन मिश्रा-
विडंबना ही है कि भारतीय समाज में जैसे-जैसे स्वतंत्रता और आधुनिकता का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे महिलाओं के प्रति संकीर्णता का भाव बढ़ता चला गया। दुख तब होता है जब प्राचीन समाज की तर्ज पर ही अभी भी महिलाओं पर अत्याचार की ख़बरें आती हैं, जबकि आज हम आधुनिक समाज में आ चुके हैं, जहां महिलाओं को पुरुषों की बराबरी पर हम बात करते हैं। महिलाओं की शिक्षा और बौद्धिक क्षमता का हम लोहा मान रहे हैं। जहां केंद्र सरकार बेटियों की शिक्षा और संरक्षा के लिए ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसी कई महत्वाकांक्षी योजनाओं का जोर-शोर से प्रसार कर रही है। जगह-जगह जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, फिर भी महिलाओं के खिलाफ छिट-फुट घटनाएं हो ही रही हैं जो काफी हृदय विदारक हैं। सवाल है कि क्या सरकार के स्तर पर ही हर समस्या का समाधान संभव है ? या सरकार की पहल के साथ हमें भी खुद तथा अपने आस-पड़ोस के प्रति कुछ दायित्वों को समझना होगा ? 

कुछ हकीकत है जिसे स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि जब तक हम हकीकत नहीं स्वीकारेंगे, लक्ष्य निर्धारित नहीं कर पाएंगे। गौर करें तो महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से केंद्रशासित राज्य बेहतर हैं। रिपोर्ट के मुताबिक लक्षद्वीप महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से प्रथम और नगालैंड दूसरे स्थान पर है। इसी तरह दमन और दीव तथा दादर नगर हवेली भी महिलाओं के लिए सुरक्षित स्थान है। लेकिन वहीं देश के अधिकांश राज्यों से महिलाओं के साथ हुए अपराध की घटनाएं दुखद होती हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि महिलाएं सिर्फ सड़कों व सार्वजनिक स्थानों पर ही असुरक्षित नहीं है, बल्कि वह अपने घर-परिवार और रिश्ते-नातेदारों की जद में भी असुरक्षित हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो उद्घाटित कर चुका है रिश्तेदारों द्वारा बलात्कार किए जाने की घटनाओं में अप्रत्याशित रुप से वृद्धि हुई है। दुष्कर्म की घटनाओं में तकरीबन 95 फीसदी मामलों में पीड़ित लड़की दुष्कर्मी को अच्छी तरह जानती-पहचानती है फिर भी उसके खिलाफ अपना मुंह नहीं खोलती। शायद उसे भरोसा नहीं होता है कि कानून व समाज उसे दण्डित कर पाएगा। सवाल उठता है ऐसा क्यों है ? पुलिस के प्रति भी इतनी अविश्वसनीयता का माहौल क्यों ? क्या पुलिस विभाग को अपने कार्यस्वरूप पर पुनः गौर करने की ज़रूरत नहीं है ? ये वो सवाल हैं वो हर एक के दिलो-दिमाग पर होगा।
दरअसल, महिलाओं के उत्पीड़नकर्ताओं के मन में सजा का भय ही नहीं है यही वजह है कि बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों में वृद्धि हो रही है। गौर करें तो बलात्कार के मामलों में सजा की दर बेहद कम है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2006 में यौन उत्पीड़न मामले में सजा की दर 51.8 फीसदी, 2007 में 49.9, 2008 में 50.5 और 2009 में 49.2 फीसद रही। इन आंकडों से साफ है कि दुष्कर्म के अधिकतर मामले में अपराधी सजा से बच जा रहे हैं। यानी महिलाओं पर होने वाले समग्र अत्याचारों में सजा केवल 30 फीसदी गुनाहगारों को ही मिल रही है। सवाल यहां अदालत पर प्रश्नचिह्न लगाना नहीं, बल्कि उचित साक्ष्यों का न मिल पाना है। ऐसे में अगर बलात्कारियों और यौन उत्पीड़नकर्ताओं का हौसला बुलंद होता है तो यह अस्वाभाविक नहीं है। इस समय देश में तकरीबन 95,000 से अधिक बलात्कार के मुकदमे अदालतों में लंबित हैं। ये वे आंकड़े हैं जो पुलिस द्वारा दर्ज किए जाते हैं। अधिकांश मामले में तो खबर यहां तक आती है कि पुलिस रिपोर्ट दर्ज करती ही नहीं है। दूसरी ओर लोकलाज के कारण भी ऐसे मामलों को पीड़िता के परिजनों द्वारा दबा दिया जाता है।
इन्हीं परेशानियों का ध्यान रखते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 17 मई 2017 को राष्ट्रीय महिला नीति, 2016 का मसौदा जारी किया। राष्ट्रीय महिला अधिकारिता नीति, 2001 के लगभग डेढ़ दशक के बाद केंद्र सरकार ने महिलाओं के संपूर्ण विश्वास को ध्यान में रखते हुए इस तरह की राष्ट्रीय नीति पर काम किया है। सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में जब भारत विश्व की तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था बन चुका है। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार ने महिला सशक्तिकरण के लिए विशेष कदम उठाने की ओर काम करने का निर्णय लिया है। इसके तहत महिलाओं के लिए विशेष तौर पर खाद्य सुरक्षा एवं पोषण सहित स्वास्थ्य, शिक्षा, आर्थिक उपाय, शासन एवं निर्णय करने में महिलाओं की भूमिका जैसे बिंदुओं पर प्रमुखता से गहन-चिंतन किया गया है, तो वहीं इनके कार्यान्वयन में महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकने, महिलाओं में उद्यमशीलता के संवर्धन के लिए ईको-प्रणाली बनाना, सभी हितधारकों का प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण, कार्यस्थलों में महिलाओं को सुविधा जैसे कई विषयों पर विस्तृत अध्ययन कर रूपरेखा तय की गई है।
जाहिर है, भारतीय महिलाओं को अपराधों के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करने तथा उनकी आर्थिक तथा सामाजिक दशाओं में सुधार करने हेतु ढ़ेर सारे कानून बनाए गए हैं। इनमें अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956, दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, कुटुम्ब न्यायालय अधिनियम 1984, महिलाओं का अशिष्ट-रुपण प्रतिषेध अधिनियिम 1986, गर्भाधारण पूर्व लिंग-चयन प्रतिषेध अधिनियम 1994, सती निषेध अधिनियम 1987, राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 1990, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006, कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध, प्रतितोष) अधिनियम 2013 प्रमुख हैं। इसके बाद महिला एवं बाल विकास मंत्रालय भी बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, वूमेन हेल्पलाइन स्कीम, वन स्टॉप सेंटर स्कीम, महिला ई-हाट, महिलाओं को प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए नारी शक्ति पुरस्कार प्रदान करने जैसी कई योजनाओं की शुरूआत की और सबसे अहम कि केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई इन योजनाओं से सफलता भी मिली। हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश समेत देश के कई राज्यों में लिंगानुपास में सुधार की रपटें समाचार-पत्रों के माध्यम से आ रही हैं। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में पिछले वर्ष जहां 6 वर्ष तक के आयु वर्ग में लिंगानुपात एक हजार बेटों के मुकाबले 887 बेटियां थीं जो अब बढ़कर एक हजार बेटों पर 920 बेटियां हो गया है। वर्ष 2001 में जो हरियाणा देश के सभी राज्यों का सबसे खराब लैंगिक अनुपात 1000 लड़कों पर 834 लड़कियां पर था। वहीं अब इस राज्य ने पिछले वर्ष वर्ष 2016 में एक हजार लड़कों पर 900 लड़कियों का लैंगिक अनुपात हासिल कर लिया है।
लेकिन फिर बात आकर वहीं ठहरती है कि क्या सरकार की योजनाओं और सख्ती से ही हर विषय का समाधान संभव है कि कहीं-न-कहीं परिवर्तन हम सब में चाहिए। वो परिवर्तन विभाग से लेकर विचारधारा और फिर नैतिकता से भी है। हमारी माताओं को भी बेटियों को कैसे ढृढ़ता से समाज में गलत पर आवाज़ उठानी है, उसकी हिम्मत देनी होगी। हर पिता तथा अभिभावक को बेटियों की शिक्षा पर ध्यान देना होगा। उन्हें समाज में सिर उठाकर जीने का हौंसला देना होगा। यह तय है कि हमारी बेटियों ने जिस दिन चुप्पी तोड़ी, सिर उठाकर जीना सीख लिया, कलम थाम ली, उस दिन से यकीन मानिए, एक नए सामाजिक क्रांति की शुरूआत होगी जिससे सरकार भी प्रेरित होगी और प्रशासन भी।
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