-दद्दन मिश्रा- विडंबना ही है कि भारतीय समाज में जैसे-जैसे स्वतंत्रता और आधुनिकता का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे महिलाओं के प्रति संकीर्णता का भाव बढ़ता चला गया। दुख तब होता है जब प्राचीन समाज की तर्ज पर ही अभी भी महिलाओं पर अत्याचार की ख़बरें आती हैं, जबकि आज हम आधुनिक समाज में आ चुके हैं, जहां महिलाओं को पुरुषों की बराबरी पर हम बात करते हैं। महिलाओं की शिक्षा और बौद्धिक क्षमता का हम लोहा मान रहे हैं। जहां केंद्र सरकार बेटियों की शिक्षा और संरक्षा के लिए ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसी कई महत्वाकांक्षी योजनाओं का जोर-शोर से प्रसार कर रही है। जगह-जगह जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, फिर भी महिलाओं के खिलाफ छिट-फुट घटनाएं हो ही रही हैं जो काफी हृदय विदारक हैं। सवाल है कि क्या सरकार के स्तर पर ही हर समस्या का समाधान संभव है ? या सरकार की पहल के साथ हमें भी खुद तथा अपने आस-पड़ोस के प्रति कुछ दायित्वों को समझना होगा ? कुछ हकीकत है जिसे स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि जब तक हम हकीकत नहीं स्वीकारेंगे, लक्ष्य निर्धारित नहीं कर पाएंगे। गौर करें तो महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से केंद्रशासित राज...
Daddan Mishra, Member of Parliament
Shravasti, Uttar Pradesh